तनु रावत बिष्ट, वरिष्ठ पत्रकार.

जानवर हो या इंसान हम सबका नामकरण कर देते हैं और वहीं से सम्बन्धों और संवेदनाओं का जुड़ाव शुरू हो जाता है! उमा देवी, एक गर्भवती हथिनी जिसकी मौत हो गई या कहे कि हत्या कर दी गई वो भी एक ऐसे राज्य में जिसकी साक्षरता 93% से ज़्यादा है, लेकिन ये कैसी साक्षरता हैं। ऐसी पढ़ाई किस काम की जब इंसान जानवर बन जाए और जानवर को तड़प-तड़प कर जलसमाधि लेने को मजबूर होना पड़े। इस घटना ने अन्तरात्मा को झकझोर दिया। केरल के मलप्पुरम में बेमौत मारी गई उमा के दर्द को, उसके चरम को कोई कवि, कोई लेखक न तो क़लम में बाँध सकता है न ही महसूस कर सकता है…उस दर्द के पीछे एक ऐसा दर्द भी था जिसे इस निर्दयी दुनिया ने नज़रअंदाज़ कर दिया..वो दर्द था एक माँ का, वो दर्द था गर्भाधारण का, वो दर्द था पेट में पल रहे एक बच्चे का..क्या कभी आपने सोचा है कि गर्भ धारण की प्रक्रिया कितनी दर्दभरी,कितनी मुश्किल भरी,कितनी संवेदनाओं और उम्मीदों में डूबी हुई होती है..इस दर्द को महसूस करने के लिए इस पुरुष समाज को एक स्त्री होना पड़ेगा, एक माँ का रूप लेना पड़ेगा..तब कहीं जाकर उस अनदेखे दर्द को आप समझ पाएँगे..

केरल के मलप्पुरम में गर्भवती हथिनी की मौत पर पूरा देश गुस्से में है. इस बीच गर्भवती हथिनी की प्राथमिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट सामने आ गई जिसमें कई खुलासे हुए हैं.

रिपोर्ट के अनुसार
1. विस्फोट के कारण मुँह पर घाव
2. हथिनी कई दिनों से भूखी थी
3. 10 से 12 दिनों से काफी दर्द में थी
4. दर्द के कारण कमज़ोरी से पानी में गिरी
5. पानी में डूबने के कारण फेफड़ों में पानी
6. फेफड़ों का काम करना बंद

घायल होने के बाद वो इतनी पीड़ा में थी कि तीन दिन तक वेलियार नदी में खड़ी रही और उस तक चिकित्सीय मदद पहुंचाने के सभी प्रयास नाकाम रहे.

उस हथिनी को बारूद से भरा अनानास देने वाले राक्षस को शायद नहीं मालूम होगा एक हथिनी कितनी मुश्किल से एक बच्चे को जन्म देती है..अगर आप साइंस के स्टूडेंट नहीं तो फिर शायद ही आपको मालूम हो हथिनी को मैमल्स यानी स्तनधारी जीवों में सबसे लंबा गर्भधारण करना पड़ता है..सोचिए गायों में करीब 280 दिन, शेरनी में 100 से 115 दिन, घोड़ी 330 दिन, ऊंटनी में करीब 400 दिन का गर्भकाल होता है..बात करें होमो सेपियंस यानी इंसानों की तो हममें 9 महीने यानी करीब-करीब 270 दिन का प्रेग्नेंसी टाइम रहता है..यानी यहां बताए सभी जीवों में हथिनी दोगुना समय गर्भकाल में लेती है…हथिनी 20 से 22 महीने तक यानी करीब 620 दिन से ज्यादा लंबे वक्त तक अपने गर्भ में बच्चे को रखती है..और कम से कम 4 साल बाद दोबारा गर्भवती होती है..

अब सोचिए इतने लंबे वक्त में उसे कितनी समस्याओं से गुजरना पड़ता होगा,उसकी मानसिक स्थिति कैसी रहती होगी.. जैसे एक स्त्री 9 महीने में अनायास दर्द सहती है, तब जाकर इस धरती पर बच्चे को जन्म देती है..और उसकी एक झलक के लिए कुछ भी कर गुजरती है…ठीक उसी तरह वो हथिनी भी थी जो तीन दिन तक वेल्लियार नदी में खड़ी रही, अपने खातिर नहीं, अपने भीतर पहुंच चुकी बारूद की ज्वाला की खातिर नहीं..अपने बच्चे की खातिर..जो उसे 20 से 22 महीने तक ज़िन्दा रखना था..क्योंकि हाथी का व्यवहार तब ज्यादा उग्र हो जाता है जब उसे चोट पहुँचती है या वो खतरे में होता है..तब वो सामने आने वाली हर चीज़ को तहस-नहस कर देता है..

नेशनल जियोग्राफिक चैनल्स में अक्सर वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट हाथी के चरित्र के बारे में यही बात दोहराते हैं…लेकिन इस केस में पलक्कड़ की हथिनी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया..इसका सीधा सा मतलब था वो प्रेग्नेंट थी, एक माँ की तरह सोच रही थी..किसी भी तरह वो पेट में पल रहे बच्चे को सुरक्षित इस दुनिया में लाना चाहती थी..लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, यक़ीनन हथिनी के अंदर बारूद से पहले पेट में पल रहे बच्चे ने दम तोड़ा होगा..

तब जाकर नदी के उस पानी में हथिनी ने समाधि ली होगी..तब जाकर उसने दुनिया छोड़ने का साहस खुद में जुटाया होगा..अब आते हैं असल मुद्दे की ओर…एक तरफ कुछ हैवानों ने हथिनी को तड़पातड़पाकर मारा तो बाकी बचे लोग इसी वीभत्स घटना पर गज़ब की पॉलिटिक्स में जुटे हैँ..केरल से दिल्ली तक हंगामा मचा है..वहीं कई राजनेताओं ने शोक तक नहीं जताया, जानते हैं हाथी या हथिनी वोट थोड़े ना देते हैं..और देते भी तो भी एक हथिनी ही तो मरी है..2017 की सेंसस की मानें तो देश में हाथियों की जनसंख्या करीब 27 हज़ार है..अब उनमें से एक ही हथिनी तो कम हुई है, माफ़ कीजेगा दो.. एक पेट में पल रहा बच्चा भी तो था!!!

मनोविज्ञान

“कम-से-कम जानवरों के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। जब लोग इंसानों के प्रति जघन्य क्रियाओं से स्वयं को नहीं रोकते , तो वे पशुओं के प्रति क्या रोकेंगे ? किसी जानवर के साथ कोई ऐसी हरक़त कोई कैसे कर सकता है जबकि जानवरों के प्रति दुर्व्यवहार पहले शुरू होता है, इंसानों के प्रति उसे बाद में बरता जाता है। जो पहले जीव-जन्तुओं को बचपन में सताते हैं , उन्हीं में से अनेक आगे जाकर तरह-तरह मनोरोगी अपराधी बनते हैं, जीवों के प्रति हिंसा पहले शुरू होती है बाद में मानवीय हिंसा की जाती है।

पशुओं के प्रति बढ़ती क्रूरता के मनुष्यों के लिए कई मायने हैं। अनेक कारणों और प्रकारों से पशुओं के प्रति क्रूरता की जाती रही है। किन्तु वर्तमान समय में यह क्रूरता नए तरीक़े से सामने में आ रही है। जानवरों के प्रति बदसलूकी केवल जानवरों तक ही सीमित समझना नादानी है, ज़्यादातर इन क्रूर घटनाओं से भविष्य के ढेरों अपराधों व अपराधियों को भविष्य में पहचानने में मदद मिलती है। बाल और वयस्क यौन-अपराध , घरेलू मारपीट व दुर्व्यवहार , बलात्कार , नशावृत्ति, जुआ और हत्या तक के मामलों को हम पीछे ट्रेस करते जाते हैं , तब अनेक पशु-क्रूरता की घटनाएँ प्राथमिक तौर पर मिलती हैं।

जो आज नन्हें बेज़ुबान पिल्ले को जीवित जला रहा है , वह कल किसी मासूम बच्ची के साथ बलात्कार कर सकता है। जो आज अवन में खरगोश को जिन्दा भून रहा है , वह कल किसी मनुष्य की हत्या कर सकता है। जिसने आज किसी गर्भवती हथिनी को धोखे से पटाखों से भरा अन्नानास खिलाया है , उसने अपराधी के तौर पर अपराध-जगत् में अपनी दस्तक दे दी है। पशु-क्रूरता के मूल में मनुष्यों में जानवरों के प्रति घटती समानुभूति है : जिससे हम समानुभूत नहीं होते, उसका कष्ट हमें प्रभावित भी नहीं किया करता।

भावनात्मक समानुभूति को महसूस करते समय हम दूसरे के कष्ट का अनुभव करते हैं, उसपर क्या बीत रही होती है , इसे स्वयं पर लेकर महसूस करने की कोशिश करते हैं। यह भावनात्मक समानुभूति ही हमें पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के क़रीब ले जाती है , इसी वजह से हम उनसे गहरा भावुक जुड़ाव सीखते हैं।

बीते काफ़ी समय से हमारे बच्चे प्रकृति से दूर हुए हैं। जानवरों और चिड़ियों की जगह गैजेटों और उपकरणों ने ले ली है। परिवार दरक रहे हैं , ढेरों बच्चों को पारिवारिक कलह-मारपीट, नेग्लेक्ट होना या तलाक जैसी दुर्व्यवस्थाओं का दुष्प्रभाव झेलना पड़ रहा है। रिश्ते कम-से-कम संजीव और अधिक-से अधिक होते जा रहे हैं और यान्त्रिकता में वृद्धि होती जा रही है। ऐसे में तरह-तरह के मनोविकारों को पनपने का अवसर मिल रहा है। इस तरह की विकृतियों को लिये बच्चे अपराध का प्रथम प्रयोग किसी पशु पर ही करते हैं। मनुष्यों की बारी बाद में आएगी।

क्रूरता को जब कौतुहल का साथ मिल जाता है , तब वह विकृत घटनाओं को एक-के-बाद-एक जन्म देती है। बुरे सम्बन्धों के दौर में पल रहे मशीन बने बच्चे पशुओं पर क्रूरता का अभ्यास करेंगे , ताकि वे आगे अपने नवीन मानव-सम्बन्धों पर उनकी रक्तरंजित छाप छोड़ सकें।

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