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Total Samachar… प्रजातंत्र गरिमा पूर्ण जीवन और वैश्विक मानव

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डॉ आलोक चांटिया, अखिल भारतीय अधिकार संगठन

यह भी एक सत्य बनकर सामने आया है कि प्रजातंत्र के रूप में जिस जनता के शासन जनता के द्वारा जनता के लिए का दर्शन सामने रखा जाता है। वह दर्शन आभासी रूप में तो सत्य हो सकता है। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर सिर्फ जनता एक साधन मात्र है और उसके माध्यम से सरकार सिर्फ अपने स्थायित्व अपनी निरंतरता को सुनिश्चित करते हैं। जो अप्रत्यक्ष रूप से राजतंत्र का एक ऐसा अप्रत्यक्ष स्वरूप है। जिसमें आज भी राजा की दान वीरता वाली कहानियों की तरह राजा को मात्र कुछ उपहार स्वरूप जीवन की न्यूनतम आवश्यकता को पूर्ण करने वाली वस्तुओं को देने के सिवा सरकार किसी भी गरिमा पूर्ण जीवन को देने के लिए ना तो प्रयास करती है और ना ही उस गरिमा के लिए कोई कार्य करती है।

जीवन में गरिमा पूर्ण जीवन का तात्पर्य सिर्फ सांसो को चलाए रखने के लिए दो रोटी का मिल जाना यदि संवैधानिक रूप से गरिमा पूर्ण जीवन ही है। तो फिर इसको आदर्श स्थिति मानकर सरकार द्वारा राज्य द्वारा सभी लोगों के पास इन दो रोटी के अलावा जो भी धन है। उसका संचयन कर लिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा ना किया जाना यह बताता है। स्वयं ही सिद्ध करता है कि गरिमा पूर्ण जीवन के लिए जो मानक है। उसके अनुरूप सरकार या राज्य द्वारा यह स्वयं स्वीकार किया जा चुका है कि ज्यादातर लोग गरिमा पूर्ण जीवन नहीं जीते हैं। सिर्फ सरकार के स्थायित्व और निरंतरता में सहयोग करने के लिए तथा प्रजातंत्र की परिभाषा और उसके भाव को स्थापित करने के लिए सिर्फ कुलीन तंत्रओं की सरकार से इतर गरीब भूखे लोगों के माध्यम से भी सरकार को बनाए जाने की जो प्रक्रिया दिखाई जाती है।

आज उन्हीं को प्रजातंत्र कहकर परिभाषित किया जा रहा है। जो वास्तव में प्रजातंत्र की ना तो मूल भावना के अनुरूप है। ना प्रजातंत्र का वह आदर्श स्वरूप है। जिसमें समानता का बोध है। जिसमें भेदभाव नहीं है। जिसमें अवसर की समानता है और उन सब से ऊपर उठकर गरिमा पूर्ण जीवन की स्थिति है। गरिमा पूर्ण जीवन से तात्पर्य मनुष्य के जीवन के हर स्तर पर उसको इस भावना से प्रेरित करना कि वह सर्वोच्च है और उसके अस्तित्व के लिए कोई भी अप्रिय स्थिति को पैदा करने के विरुद्ध सरकार सदैव जागृत है। इस स्थिति में ना तो इसी तरह के दंड के विधान में और ना ही किसी सामान्य जीवन की प्रक्रिया में ऐसी स्थिति आनी चाहिए। जिसमें मनुष्य को स्वयं इस बात का अपराध बोध हो कि वह मनुष्य क्यों बना जब भी किसी भी मानव या मनुष्य में इस तरह की भावना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आने लगी कि मानव जीवन जानवर की तरह हो गया है।

मानव जीवन पाकर उसे क्या मिला या मानव जीवन में उस से बेहतर वह लोग हैं। जो आराम से हर सुविधा प्राप्त कर रहे हैं या इस बात का उसे दुख हो कि वह जो भी चाहता है। अपने जीवन को न्यूनतम स्तर पर अच्छे तरीके से चलाने के लिए वह उसकी पहुंच से या तो दूर है या उसको मिलना बहुत मुश्किल है। यदि वह अपनी न्यूनतम इच्छाओं की पूर्ति करने में सक्षम हो और उन सक्षम स्थितियों के लिए आवश्यक स्थितियां परिस्थितियां वह उत्पन्न करने में सक्षम हो और जो लोग इन परिस्थितियों को उत्पन्न करने में सक्षम है या जिनके माध्यम से वह इन अपनी इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है।

यदि वह लोग भी उस स्थिति को पूर्ण करने में कोई रुचि ना रखें। यह स्वयं अपनी स्थितियों की बाध्यता और लाचारी दिखाकर ऐसी स्थितियों को पूर्ण करने से बचने का प्रयास करें। तो निश्चित रूप से मनुष्य गरिमा पूर्ण जीवन नहीं जी रहा है। सिर्फ गांव में स्कूल खोल देना और उन स्कूलों में दी जा रही। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति में समाज को समझने की अपने जीवन को ज्यादा बेहतर तरीके से जीने की और अपने से पूर्व के लोगों के जीवन से ज्यादा बेहतर जीवन जीने की यदि स्थितियां पैदा ना की जा सकती हो और सिर्फ ऐसी शिक्षा व्यवस्था खानापूर्ति के लिए हो। जिसका रेखांकन और विभाजन एक ग्रामीण आसानी से करते हुए यह मानता हो कि उसके गांव के बच्चों को मिलने वाली शिक्षा और शहरों के स्कूल में प्राइवेट शिक्षा पद्धति में पर्याप्त अंतर है और उसके बच्चे उस तरह से नहीं बन सकते हैं।

जैसे शहर के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे बन सकते हैं या बनते हैं और ऐसी स्थिति में सरकार सिर्फ औपचारिकता में स्कूल खोलकर शिक्षकों की भर्ती करके उन मानकों को भी स्थापित करने का प्रयास ना करें। जो शहर की तरह ही शिक्षा गांव में दे सकें और इस बात को महसूस करते हुए यदि कोई व्यक्ति स्वयं ग्रामीण स्कूल में पढ़ाने के सिवा कोई विकल्प न पाए क्योंकि उसके पास धन नहीं है। उसके पास व्यवस्था नहीं है। जिससे वह अपने वर्तमान में पाए हुए जीवन में उस तरह की सारी सुख सुविधा पा सके। जो शहर स्थापित शिक्षा पद्धति से बच्चों को पढ़ा कर भविष्य में प्राप्त हो सकती थी। तो इस तरह का मनोभाव आने पर और इस तरह के मनोविज्ञान के विकसित होने पर निश्चित रूप से उस मानव के स्तर पर गरिमा पूर्ण जीवन का अभाव है शून्यता है और इसीलिए गरिमा पूर्ण जीवन क्या होता है और आदर्श स्थिति में गरिमा पूर्ण जीवन किसे कहा जाए।

वह कौन सी न्यूनतम स्थिति है जिसे गरिमा पूर्ण स्थिति कहा जाए। उसका भी आकलन करने के लिए वर्तमान कोरोना वायरस के समय फैली अराजकता और गरीबों के जीवन में उत्पन्न विपरीत परिस्थिति ने एक ऐसे वातावरण की ओर इंगित किया है। जिस पर गंभीर और गहरे शोध की आवश्यकता है। सिर्फ दो रोटी खिलाना न्यूनतम स्तर पर चारदीवारी से अधिक मकान सिर्फ सुरक्षा और संरक्षा को ध्यान में रखते हुए बना देना। मानव के गरिमा को जीवन को स्थापित नहीं कर सकता है क्योंकि पृथ्वी पर पाया जाने वाला कोई भी जीव जंतु स्वयं के स्तर पर अपने को जीवित रखने के लिए अपने निर्धारित भोज्य पदार्थ को प्राप्त करता ही है। अपने को सुरक्षित रखने के लिए अपनी तरह से प्राकृतिक आवासों को बनाता ही है। इसलिए इस तरह की कोई भी व्यवस्था जिसमें स्वयं के स्तर पर न्यूनतम रूप से अपने को जीवित रखने का प्रयास स्वयं किसी भी प्राणी द्वारा किया जाए या उस प्राणी को जीवित रखने के लिए उन्हें न्यूनतम व्यवस्थाओं को वर्तमान की राष्ट्र राज्य की संकल्पना में पूर्ण किया जाए।

तो यह सिर्फ एक प्राकृतिक व्यवस्था का प्रतिबिंब है। ना की गरिमा पूर्ण जीवन का जीवन में व्यक्ति के अस्तित्व उसकी स्वतंत्रता उसके ज्ञान और उसकी जीवन की वह शैली जो जटिल होते संस्कृति में उन सारे आवश्यक स्थितियों में अपने को लाभ की स्थिति में देखने के लिए दिखाई दे और उन स्थितियों को चाहे व्यक्ति द्वारा स्वयं की शिक्षा व्यवसाय आदि के माध्यम से या सरकार की कल्याणकारी राज्य की संकल्पना में स्वयं अपने कर्तव्य बोध में अपने नागरिकों को उच्च स्तर पर उपलब्ध कराया जाए। तब उस स्थिति में किसी व्यक्ति के जीवन को गरिमा पहुंच जीवन माना जा सकता है और इसीलिए गरिमा पूर्ण जीवन की वास्तविक सामाजिक और सांस्कृतिक व्याख्या निश्चित रूप से बहुत आवश्यक है। सिर्फ या कह देने से संतोषम परम सुखम और होता वही है। जो भगवान चाहता है।

सब भगवान की इच्छा है आदि जैसे आदर्श दर्शन के आधार पर व्यक्ति को अपनी सीमाओं में मानव होते हुए एक जानवर के तरह प्राकृतिक नियमों के अंतर्गत रहने की व्यवस्था को कभी भी गरिमा पूर्ण जीवन नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वर्तमान में प्रकृति के पूर्ण रूप से मनुष्य द्वारा अधिकृत कर लिए जाने के बाद जानवर भी अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूर्ण करने में लाचारी महसूस कर रहा है। उसका जीवन मानव जैसे असहाय प्राणी के सामने भी भौतिक संस्कृति के माध्यम से एक खतरनाक स्थिति में है। वह उतनी स्वतंत्रता से ना तो जंगल में रह पा रहा है। ना अपने जीवन को सुनिश्चित कर पा रहा है। इसलिए उस प्राकृतिक गरिमा से आज जानवर भी दूर है। जिस प्राकृतिक गरिमा के सहारे वहां आकाश में उड़ता था। जंगल में कुणाचे मारता था और इसी का विस्तार आज एक प्रतिबंधित रूप में मानव के जीवन में भी दिखाई दे रहा है। जहां पर गुलामी जैसे शब्द का पूरी तरह विलोपन हो चुका है। लेकिन संस्कृति की जटिलता में शरीर में आए परिवर्तन और संसाधनों और जनसंख्या के बीच के असंतुलन से मुद्रा के बढ़ते दबाव के बीच में वह उस किसी भी स्थिति को नहीं अपनाने में स्वतंत्र रह गया है।

जो प्राकृतिक अवस्था में वह कर सकता था और ऐसे मुद्रा प्रभावी जीवन में मुद्रा आधारित आवश्यकताओं को पूर्ण करने की क्षमता में सक्षम होने की स्थिति में यदि एक व्यक्ति अपने को पाता है और देश की विधि सामाजिक नियंत्रण तथा स्वयं के नैतिक बोध में वह इसे पर आलौकिक दुनिया का श्राप मानते हुए अपने कुंडली बनाकर एक श्रापित जीवन की तरह अपने वर्तमान को जीता है और इस बात पर दुखी भी रहता है कि उसे जीवन में वह सारे सुख नहीं मिले। जो वहां अपने आधार पर विश्लेषण करके दूसरे लोगों में महसूस करता है। तो उस स्थिति में मानव निश्चित रूप से गरिमा पूर्ण जीवन नहीं जी रहा है और उस गरिमा पूर्ण जीवन की व्याख्या वर्तमान के संदर्भ में वैश्विक स्तर पर मुद्रा के बढ़ते दबाव बढ़ती जनसंख्या घटते संसाधनों में सामाजिक सांस्कृतिक रूप से एक सामान्य स्थिति में होना चाहिए। ताकि वह भी गरिमा पूर्ण जीवन जी सके इस स्थिति का भी आंकलन गंभीरता से मनोवैज्ञानिक स्तर पर सामाजिक सांस्कृतिक स्तर पर शोध का विषय है।

जिसे वर्तमान में लॉक डाउन को लागू किए जाने पर ना सिर्फ महसूस किया गया है। बल्कि एक बहुत बड़ा ऐसा क्षेत्र सामने आया है। जिसमें मनुष्य को अपने गरिमा पूर्ण जीवन में कमियों का एहसास हुआ है। जिस कमी को राज्य सरकार और प्रशासन शासन बुद्धिजीवी न्यूनतम स्तर पर विश्लेषण करके इस बोध को सामने लाने का प्रयास कर सकते हैं कि वह कौन सा स्थान है। जहां पर मनुष्य को न्यूनतम स्थिति में अपने अंदर गरिमा का बोध होता है और इस गरिमा को जीवन के बोध को सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र 1948 के प्रकाश में परिभाषित किया जाना चाहिए। ताकि विश्व का कोई भी देश हो वहां पर कल्याणकारी राज्य की संकल्पना में सिर्फ दो रोटी दे दिया जाना बिजली के एक बल्ब को लगा दिया जाना और चारदीवारी से घिरे हुए स्थान को आवास कहकर उसे गरिमा पूर्ण जीवन से संदर्भित करने के बजाए गरिमा पूर्ण जीवन में उन तथ्यों का सम्यक बोध हो जिससे मनुष्य के कार्यशैली में उसके मस्तिष्क में और उसके शारीरिक मानसिक विकास में एक स्वतंत्र गति दिखाई दे। जिसमें उसकी मुस्कुराहट हो उसकी चपलता हो उसकी हंसी हो जो वास्तविक अर्थों में गरिमा पहुंच जीवन का एक मानक हो और उसका प्रदर्शन हो। इसलिए यह एक सबसे बड़ा प्रश्न सभी के सामने हैं कि गरिमा पूर्ण जीवन वास्तविकता में क्या है।

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