डॉ दिलीप अग्निहोत्री

कुछ वर्ष पहले तक देश में मृदा हेल्थ परीक्षण का कोई महत्व नहीं था। यह माना जाता था कि अधिक केमिकल खाद व पानी के प्रयोग से अधिक उपज हासिल की जा सकती है। प्रारंभ में अनाज का उत्पादन बढा, लेकिन केमिकल के कारण कुछ दशकों में खेत की सेहत भी कमजोर पड़ने लगी। पिछले पांच छह वर्षों से मृदा हेल्थ परीक्षण अभियान चलाया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट के आधार पर ही पानी व खाद की मात्रा का निर्धारण किया जा रहा है। इससे कृषि लागत में कमी हुई है। फसल की गुणवत्ता भी बढ़ी है। इसके अलावा पशुओं के साथ भी अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। मांस का उत्पाद बढ़ाने के लिए अनेक हानिप्रद व कष्टप्रद प्रयोग किये जा रहे है।

इन तथ्यों पर विचार हेतु राष्ट्रीय सेवा योजना लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल के संयुक्त तत्वाधान में वेयर इज आवर फ़ूड कमिंग फ्रॉम शीर्षक पर एक वेबीनार आयोजित की गई। स्वर्णाली नेशनल कोऑर्डिनेटर ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल ने कार्यक्रम का उद्देश्य का उल्लेख किया। कहा गया कि इस वेबीनार का उद्देश्य लोगों में हमारे भोजन के सोर्सेस के विषय में जागरूकता फैलाना है। जिससे हम यह जान सके कि कृषि उत्पाद को कैसे और किन परिस्थितियों में तैयार किया जाता है। इसके साथ साथ यह प्रक्रिया हमारे वातावरण को किस प्रकार लाभ या हानि पहुंचाती है। डॉ राकेश द्विवेदी कार्यक्रम समन्वयक राष्ट्रीय सेवा योजना लखनऊ विश्वविद्यालय ने कहा कि जो भी क्रॉप कल्टीवेशन होता है। उसमें कौन से फर्टिलाइजर और पेस्टिसाइड का प्रयोग हो रहा है।

बहुत सारे फटलाइजर अधिक उत्पादन के लिए रिकमेंड मात्रा से ज्यादा मात्रा में प्रयोग किए जा रहे हैं। जिससे हमारे फूड की क्वांटिटी तो बढ़ रही है लेकिन उसकी क्वालिटी का स्तर कम हो रहा है। और यह पेस्टिसाइड केमिकल्स मृदा की क्षमता को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। साथ ही साथ यह मृदा में मिलकर जल को भी प्रदूषित कर रहे हैं। कोरोना वायरस भी चाइना के मीट मार्केट से ही हम सबके बीच आया है। इसलिए हम समझ सकते हैं कि हमारे फूड का प्रोसेस और वह कहां कैसे बनाया जा रहा है, किन कंडीशन में बनाया जा रहा है। यह जानने के साथ साथ सब कुछ ठीक रखना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके प्रभाव हमारे स्वास्थ्य व पर्यावरण पर पड़ते हैं।

ह्यूमन सोसाइटी के सिद्धार्थ मिश्रा और उत्कर्ष मिश्रा ने पोल्ट्री फार्मिंग और पोल्ट्री फार्मिंग बैटरी केजेस इंडस्ट्रियल फॉर्मिंग आदि विषयों पर विचार व्यक्त किये। बताया कि पिछले दस सालों में नॉन वेज फूड की डिमांड बढी है। जिसको पूरा करने के लिए करीब अस्सी बिलियन चिकन फैक्ट्री फार्मिंग के द्वारा बनाए जाते हैं, जिसमें पक्षियों जानवरों को दवाएं देकर जल्दी बडा किया जता है। जिससे उनका वजन बढ़े और अधिक पैसे मिले। जानवरों को रखने के लिए कैसे तेजी से डिफोरेस्टेशन किया जा रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप एनिमल फार्मिंग के लिए तेजी से पेड़ों को काटा जा रहा है। जंगल जोकि कार्बन डाइऑक्साइड के बेस्ट अवशोषक हैं उनको नुकसान पहुंच रहा है जिससे कि वातावरण में ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है।

विश्व की तैतीस प्रतिशत जमीन और वॉटर रिसोर्सेस का प्रयोग एनिमल फार्मिंग में हो रहा है। ग्रीन हाउस गैसेस में पन्द्रह परसेंट तक भागीदार हैं। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल किस प्रकार हमारे भोजन से संबंधित है। जीरो हंगर वाटर और सेनिटेशन एंड कंजर्वेशन ऑफ फूड में पानी की कमी इन प्रॉपर कंजंक्शन अनहाइजीनिक कंडीशन यह सब हमारे स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है।अधिक उत्पादन करने के लिए मुर्गियों को ऐसे बैटरी केसेज में रखा जाता है ,जिसमें ठीक से खड़े होने की भी जगह मुर्गियों को नहीं मिलती,उन्हें बहुत ही अनहाइजीनिक कंडीशन में रखा जाता है। इन बैटरी केजेस से निकलने वाला वेस्ट डायरेक्ट रिवर में छोड़ दिया जाता है जिससे मिट्टी और रिवर वाटर भी प्रदूषित हो जाता है। रिफाइन रिड्यूस और रिप्लेस की अवधारणा को समझना आवश्यक है।

हम जो भी खा रहे हैं वह कम से कम नुकसानदायक हो। जो भी भोजन एनवायरनमेंट को नुकसान कर रहा है जैसे जंक फूड को बनाने में ज्यादा एनर्जी रिक्वायर्ड है,इस तरह के डाइट्ज का प्रयोग करके भी हम नुकसान को कम कर सकते हैं। साथ ही रिप्लेस कर सकते हैं। जैसे कि मीट प्रोटीन की जगह हम अन्य सोर्सेस व प्रोटीन भी देख सकते हैं। डेरी प्रोडक्ट की जगह हम अन्य सोर्सेस आफ कैलशियम भी देख सकते हैं। बेबीनार में एनिमल प्रोटक्शन लॉ से संबंधित जानकारी दी गई। राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारियों एवं स्वयंसेवकों द्वारा प्रतिभाग किया गया

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