डॉ आलोक चाटिया अखिल भारतीय अधिकार संगठन

मानव के सामने सिसकती गौरैया सोन चिरैया हां मेरे भैया पर फैलाए उड़ती जाए देखे गांव गौरैया सोन चिरैया हां मेरे भैया इस लोकगीत में निश्चित रूप से मानव जीवन से जुड़ी हुई गौरैया को परिभाषित किया गया है लेकिन मानो कि अपनी प्रगति कहानी में जब इस बात को भी जानने का प्रयास किया गया की मानव की सभ्यता की कहानी में उसके व्यवस्थित जीवन का क्या महत्व और सत्य है तो गौरैया ही इस बात की प्रमाणिकता बनी और यह तथ्य इस बात पर स्थापित है कि मध्य प्रदेश के भोपाल से कुछ दूरी पर स्थित भीमबेटका नाम की गुफाओं में जब 750 शैल चित्रों का आकलन किया गया तो मानव की प्रगति कहानी में इस बात को भी देखा गया कि किसी भी शैल चित्र में गौरैया नहीं है और इस आधार पर इस बात को प्रमाणित किया गया की जिस जगह पर यह शैल चित्र पाए गए हैं उस जगह के लोगों को कृषि का ज्ञान नहीं था वह खेती नहीं करते थे वह अनाज नहीं पैदा करते थे क्योंकि किसी भी शहर चित्र में गौरैया नहीं थी और इतना प्रमाणिक प्रतीक होने के बाद जब विज्ञान के युग में हमने प्रवेश किया और इस बात की विवेचना करें कि पृथ्वी से बाहर के ग्रहों पर भी हम रावण की तरह किस तरह से उन ग्रहों को अपने कब्जे में ले सकते हैं ऐसी स्थिति में मानव रावण बनने की ओर अग्रसर हो गया उसके सामने पृथ्वी सहित सारे ग्रह है छोटे पढ़ने लगे लेकिन वही मानव यह भूल गया कि उसने जिस भौतिकता की दुनिया का विस्तार किया है उस दुनिया के विस्तार में प्रदूषण और उसके लिए भस्मासुर हो गया है और इसको भी वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया गया कि बिना किसी काम को किए कोई भी मनुष्य आसानी से आ जा सकता है कि उसके क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है या नहीं यदि किसी भी व्यक्ति के रहने वाले क्षेत्र में गौरैया नहीं दिखाई दे रही है वैसे तो तितली कौवा तोता सभी आते हैं लेकिन गौरैया प्रमुख है तो इस बात को मान लिया जाना चाहिए कि उस क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा हो गया है कि सभी जीव जंतु उस स्थान से गायब हो रहे हैं और यही वह संकेत है जानने का कि प्रदूषण हो रहा है लेकिन भला हम मनुष्य होकर यह क्यों जाने कि हमारे साथ साथ दूसरे जीव जंतु जिंदा रह पा रहे हैं कि नहीं वह बात अलग है कि अपने को उच्च कोटि का मानव दर्शाने के लिए हम जियो और जीने दो की बात करते हैं लेकिन यदि ऐसा है तो फिर गौरैया विलुप्त कैसे हो रही है।

अब मानव कहेगा कि यह उसके कर्म जाने और उसका भाग्य जाने जरूर पिछले जन्म में गौरैया ने कोई ऐसा बुरा काम किया होगा जिसके कारण दुनिया से गौरैया गायब हो रही होगी और वैसे भी हम इस बात को कहने में कब चूकते हैं कि होई है वही जो राम रचि राखा तो भला मनुष्य थोड़ी ना गौरैया को खत्म कर रहा है खत्म तो उसका कर्म और उसका भाग्य कर रहा है यही कारण है कि मानव अपने चारों तरफ गायब होती गौरैया के लिए चिंतित नहीं है यदि एक मजेदार बात है कि वह इस बात की खिल्ली उड़ाता मिलेगा कि अब हर दिन मानव कोई ना कोई विश्व दिवस मनाता है लेकिन वह इस बात को मानना ही नहीं चाहता है कि विश्व दिवस मनाने का तात्पर्य है कि विश्व स्तर पर इस बात को महसूस किया जाने लगा है कि उन तथ्यों की पूरे विश्व में कमी महसूस की जा रही है लेकिन अपने को बुद्धिमान कहने वाला मनुष्य इतना अंधा हो चुका है कि वह इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहता और क्यों करें कोई पूरी दुनिया का ठेका लेकर थोड़ी ना मानो पैदा हुआ है और उसकी जिंदगी भी कितने दिन की कोई अमर होकर तो आया नहीं है जो वह पूरी दुनिया में कौन मर रहा है कौन खत्म हो रहा है कौन कम हो रहा है इसकी चिंता करें और अब तो वहां खेती से भी दूर जा रहा है माल कल्चर में वह अनाज को बाजार से खरीदने लगा है तो उससे उससे क्या मतलब कि वही गौरैया छोटे-छोटे कीड़े मकोड़े की पतंगों को अपनी नन्ही नन्ही चोटों से खाकर खेतों को साफ करती थी वातावरण के सफाई कर्मचारी की तरह काम करती थी लेकिन अब गौरैया की जरूरत क्या है तो सफाई कर्मचारी है ही और खेतों में डालने के लिए ना जाने कितने रासायनिक उर्वरक अब मौजूद हैं ऐसे में यदि गौरैया दुनिया से खत्म हो जाएगी तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा क्योंकि अब तो घरों में भी अपनों को रखने की जगह नहीं रह गई है घरों से बाहर वृद्धा आश्रम बन गए हैं घरों में बंटवारे की लकीरें खींच रही है घरों में पैसे का बटवारा हो गया है कर्ज लेकर घर में ही दो भाई अपना जीवन गुजारते हैं कोई किसी को अपना रखा हुआ धन देना नहीं चाहता ऐसे में गौरैया के लिए कौन सोचे और अगर सोचेगा तो फिर कलयुग की स्थापना कैसे होगी मानव कोई सतयुग में तो रह नहीं रहा है जो वह सत्य के रास्ते पर चलें और सत्य यही है कि जितनी दुनिया हमारी है उतनी गौरैया की है लेकिन हर अपने वाली नीति पर चलते हुए अंग्रेजों के काल में डलहौजी से हमने हड़पने की वर्णित सीख लिया जिसमें अहम् ब्रह्मास्मि का स्वर ज्यादा सुनाई देता है। यही कारण है कि हमारे चारों तरफ से ना जाने कितने जीव जंतु गायब हो गए पर हम संवेदनशील नहीं हो पा रहे हैं।

एक गौरैया कितना खाना खाती है कितने दाने गेहूं खाती है कितना पानी पीती है उससे ज्यादा तो एक पाला हुआ कुत्ता खा लेता है लेकिन अपने शरीर की रक्षा के लिए आवश्यक कुत्ता तो जरूरी है लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवश्यक गौरैया से भला मनुष्य को क्या काम या वही देश है या वही दुनिया है जहां सीता को ढूंढने के लिए राम को यह पता था कि जीव जंतु बाना और वनमानुष साथ दे सकते हैं लेकिन मानव का साथ मानव नहीं देगा यह वही देश है जहां पर सत्य की लड़ाई में पांडव के साथ ज्यादातर राजाओं ने साथ नहीं दिया तो बिल्कुल मतलब साफ है जहां पर मनुष्य को अपना हित दिखाई देगा वही काम करेगा और गौरैया से कौन सा हित उसे मिल रहा है इसकी उसे जानकारी नहीं क्योंकि वह बुद्धिमान है सर्वश्रेष्ठ है दुनिया का पृथ्वी का सबसे सुंदर प्राणी है लेकिन उसके पास चूहे की तरह चुनौती स्वीकार करने की ताकत नहीं है चूहा तो जान भी जाता है कि भूकंप आने वाला है कुत्ता और बिल्ली जान जाते हैं कि कोई आपदा आने वाली है लेकिन सब कुछ भस्मासुर की तरह विनाश का खेल खेलने वाला मानो कभी यह जान ही नहीं पाता कि उसके चारों ओर कौन सी आपदा दौड़ी चली आ रही है ऐसे में गौरैया के लिए गौरैया जाने हां अगर कोई पंडित यह बता देगा कि 100 गौरैया को खिलाने से आपके यहां राजयोग हो जाएगा या आपके पुरखों की आत्मा को शांति मिलेगी या आपके घर अच्छी संतान पैदा होगी तो फिर कुछ किया जा सकता है गौरैया को खाना भी खिलाया जा सकता गौरैया को बचाया भी जा सकता लेकिन अगर कोई लाभ अपना नहीं है तो को नृप होय हमें का हानि वाले दर्शन पर चलते हुए कुछ भी कहीं भी होता रहे लेकिन ध्यान रखिएगा एक बार अपने घर से बाहर निकल कर देख लीजिएगा अगर आपके घर के चारों ओर चिड़िया नहीं दिखाई दे रही है गौरैया नहीं दिखाई दे रही तो आप प्रदूषण वाले इलाके में रह रहे हैं अब कीचड़ में कौन रहता है या कहने की आवश्यकता नहीं वैसे आप मनुष्य हैं और आप सर्वश्रेष्ठ हैं सूचना आपको है क्योंकि जीना आपको है अगर आप जीना चाहते हैं तो गौरैया को बचा लीजिए नहीं तो तिलिस्म की कहानियों की तरह ही याद करिए कि चिड़िया की जान में ही आपकी जान है अगर चिड़िया मर गई तो आप भी !!!!!!!!!

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