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Total Samachar… गांधी जयंती से अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस तक

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डॉ आलोक चान्टिया , अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 


2 अक्टूबर अट्ठारह सौ 69 के दिन जब करमचंद गांधी के घर उनकी चौथी पत्नी पुतलीबाई में अपने चौथी संतान मोहनदास को जन्म दिया तभी यह कहावत चरितार्थ होना आरंभ हो गई थी एक पुत्र पिता के धर्म के कारण ही आगे बढ़ता है बचपन का मुनिया जब अपने दोस्त ऊका के साथ स्कूल में दी गई मिठाई को आपस में बैठता है तो मैं इसका विरोध करती हूं पर पहली बार बचपन का मुनिया यह सोचने लगता है कि उसके और उसके मित्र में क्या फर्क है आज यही आवश्यकता है कि जब गांधी जयंती मनाई जा रही है तो बचपन से ही बच्चों को सामाजिक स्तरीकरण के बारे में बताया जाए ताकि वह भी गांधी की तरह पूरे जीवन दलित उत्थान के लिए कार्य कर सकें वह एक अलग विषय होगा कि क्या गांधी दलित उत्थान में सफल हो सके यह भी एक निर्विवाद सत्य है कि गांधी ने जीवन के हर अच्छे-बुरे कामों से होकर गुजरने को अपने जीवन का एक हिस्सा बनाया और उससे सीख लेते हुए अपने जीवन को परिमार्जित किया यही आज प्रत्येक व्यक्ति को सीखने की आवश्यकता है कि वह अपने जीवन को खुद अनुभव के द्वारा बनाएं गांधी ने गोश्त खाया गांधी ने अपने भाई के कड़े से सोना चुराया गांधी ने शराब पिया और सभी से सीख लेकर वह अपने को परिमार्जित करते चलेगा यही नहीं अपनी कमियों को कैसे उन चाहिए देनी चाहिए या अभी गांधी से सीखना होगा यह सच है कि गांधी को अहिंसा से जोड़कर देखा जाता है लेकिन इस बात पर सभी को विमर्श करना होगा कि क्यों गांधी ने अहिंसा के रास्ते को अपनाने के बाद भी अंग्रेजों के साथ होने वाले विश्व युद्धों में भारतीय सैनिकों को जाने के लिए प्रेरित किया तो क्या गांधी का अहिंसा वाद हम में से कोई समझ नहीं पाया है क्योंकि गांधी की अहिंसा में सशक्त तो होते हुए भी कमजोर को हानि ना पहुंचाने का दर्शन छिपा हुआ है।

यही कारण है कि गांधी भारत जैसे देश में हिंदुत्व की स्थापना में अहिंसा को उच्च स्तर पर ले जाकर देखते हैं जहां पर वह हिंदू संस्कृति में अल्पसंख्यकों को कमजोर मानते हुए हर तरह का लाभ देने की बात करते हैं लेकिन इन सबके बीच में हुआ भविष्य का आकलन नहीं करते है पर उनका प्रभाव यह जरूर दिखाई देता है कि संविधान में अहिंसा की एक ऐसी परिभाषा विधिक रूप से स्थापित की गई जिसमें कमजोर और अल्पसंख्यक लोगों को संवैधानिक अधिकार प्रदान करने की वकालत कर दी गई जिसके कारण भारत एक ऐसी दिशा में बड़ा जिस पर गांधी को लेकर कभी चर्चा की ही नहीं गई जिस तरह से विश्व में सीरिया जॉर्डन मिश्रा इराक ईरान अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान आतंकवाद की चपेट में है युद्ध की चपेट में है उससे यह बात विमर्श का विषय बन जाती है कि अंतरराष्ट्रीय अहिंसा वाद क्या है और उसका प्रयोग किस तरह से किया जाएगा और इस अर्थ में गांधी व्यवहारिकता से ज्यादा प्रतीकात्मक बन जाते है यही नहीं गांधी के आदर्श में भारत जो मां का स्वरूप लिए हुए हैं उसका विभाजन उनकी लाश पर हो सकता है लेकिन इस दर्शन को सामने रखने के बाद भी भारत विभाजित हो जाता है जो इस विमर्श को सामने रखने का प्रयास करता है कि गांधी के द्वारा कही गई बात को मानने के प्रति भारतीय कितना समर्पित थे और इसी समर्पण को एक विपरीत अर्थ में गांधी की हत्या के समय महसूस किया जा सकता है जब भारत में बहुत से लोगों ने गांधी के मरने पर शोक व्यक्त किया बाल मुंडवा या फिर भी गांधी के विभाजन के विरोध को भारतीय रोकने में सफल ना हो सके इन सबसे बढ़कर गांधी की अहिंसा वास्तव में किन को प्रेरित करने के लिए कही गई थी यह भी विभाजन के बाद समझा जा सकता है जब ट्रेनों में लाश भर भर के आने लगे अविभाजित भारत लाशों के ढेर पर खड़ा हो गया और पहली बार इस बात का संकेत ज्यादा स्पष्ट हुआ कि गांधी की सारी बातें भारत जैसे देश में प्रतीकात्मक ज्यादा नहीं व्यवहारिकता में उसे किसी भारतीय ने उतारने का प्रयास नहीं किया और इसी को आज गांधी जयंती पर आत्मसात करने की आवश्यकता है अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर अहिंसा के माध्यम से कमजोर लोगों को आगे जाने के लिए दिए जाने वाले सहयोग को समझने की आवश्यकता है जिसमें भारत जैसे देश के स्थायित्व का उसके एकजुट रहने का और पुनः विभाजन का संकट होने का अनुनाद सुनाई तो नहीं दे रहा है यदि ऐसा है तो गांधी का दर्शन संपूर्ण विश्व के लिए प्रतीकात्मक ज्यादा है क्योंकि जिस तरह से विश्व जल रहा है और भारत में कमजोर वर्ग अपने अस्तित्व के लिए आंदोलन कर रहा है लड़ाई कर रहा है उससे यह स्पष्ट है कि गांधी के दर्शन को भारत सहित संपूर्ण विश्व वास्तविकता के धरातल पर उतारने से बच रहा है और इसीलिए वर्तमान में गांधी जयंती पर प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंदर गांधी के प्रतीकात्मक स्वरूप और व्यवहारिकता में अपनाए गए स्वरूप को तलाशना होगा तभी भारत संपूर्णता में और विश्व बंधुत्व की भावना संपूर्ण विश्व के देश एक साथ बंध सकेंगे वरना संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया जाना सिर्फ एक बेमानी होगी एक औपचारिकता होगी

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